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Showing posts from November, 2020

एक प्रश्न

सब कहते हैं कि सिंदूर औरत का सबसे सुन्दर श्रृंगार है सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, पायल बिछिया से ही उसका संसार है; बाल लंबे घने काले हो, बदन गठीला व दूध से धुला हो, सुरमई आंखों में काजल लगी हो, लब सुर्ख लाल रंगे हो, नाक पे नथ और कानों में चमकदार झुमके जगमगाते हो, नाखून सारे रंगे हो, हथेलियों पे मेंहदी की लालिमा चढ़ी हो, गले में मंगलसूत्र और मांग के सिंदूर पे मांग टीका सजी हो, बाजूबंद, कमरबंद, चूड़ी, अंगूठी, बिछिया, पायल सब हो, पर हो ही न अगर पिया का साथ तो इन सबका क्या हो? सारे व्रत व त्यौहार सिर्फ पतियों और पुत्रों के लिए होते हैं तीज, वट सावित्री, मधुश्रावणी, करवाचौथ या जीतिया, हर पूजा पे नाम है बस पुरुष तत्व का जो नियम बनाते हैं और जिनका पालन श्रृंगार में लिप्त महिलाएं करती हैं; माना कि व्रत व पूजन अटूट प्रेम की लौ जलाए रखती है, आस्था के माध्यम से आपसी विश्वास बनाए रखती है पर ये सिर्फ एक पक्ष के लिए क्यों, क्या पत्नी कुछ नहीं चाहती है? सती बने पत्नी तो क्या पति वो सतवान नहीं चाहती है? यदि सीता हो पत्नी तो क्या पति में राम को नहीं चाहती है? कौन है यहां मन्दोदरी जो पति रावण...

Words of Woman

I am here today I was there yesterday I will be there tomorrow I have always been I will always be your companion, Making you complete with the union Bringing a new era with a new generation. O man, I am your woman The ruler of half of your domain, Be you of any race, region or religion I am always there to feed you with love and passion, to remind you of your worth and obligation. I am no more or less than you But just half the part of you We are the two hands for every creation We are the two eyes of this constitution The role of both doesn't need any comparison. ©Anupam Mishra  

अमृता व प्रभा खेतान से मुलाकात

 मिली थी सपने में अमृता से कह रही थी मैं उससे उसके जाने के बाद भी सब वैसा ही है, आज भी देखते हैं लोग प्रेम को उसी नज़र से, जिसमे उम्र, जिस्म, जात पात ही मायने रखते हैं, जिसमे प्रेम की तड़प को न तो समझ पाते हैं और न ही किसी और को समझा पाते हैं  पर प्रेम की बलि न जाने कितने चढ़ जाते हैं। अमृता के साथ बैठी थी प्रभा खेतान जिसने सिमोन द बोउवार की रचना को हिंदी रूप दिया स्त्री: उपेक्षिता के नाम से नया सृजन किया  और अपने शब्दों से समाज का प्रतिकार किया, उसने भी हंस कर मेरे से प्रश्न किया "बताना स्त्रियों का इन दशकों में क्या परिवर्तन हुआ, क्या आज उस अबला उपेक्षिता का उद्धार हुआ, या फिर आज भी वह किसी के इंतज़ार में है? क्या अमृता या प्रभा के क़दमों पर आज भी पाबंदी है?" अमृता प्रभा की बातों पर खिलखिला कर हंस पड़ी वो कहने लगी, "क्या पूछ रही है यार तू भी, क्या तुझे इतना भी पता नहीं, स्त्री कभी उपेक्षिता न थी, उसने स्वयं ही स्वयं के लिए ये दशा है चुनी बता, तूने या मैंने कभी किसी से हार मानी? जैसा भी हो पथ हमने राह अपनी स्वयं ही बनाई!" अनुपम मिश्र