अमृता व प्रभा खेतान से मुलाकात
मिली थी सपने में अमृता से
कह रही थी मैं उससे
उसके जाने के बाद भी सब वैसा ही है,
आज भी देखते हैं लोग प्रेम को उसी नज़र से,
जिसमे उम्र, जिस्म, जात पात ही मायने रखते हैं,
जिसमे प्रेम की तड़प को न तो समझ पाते हैं
और न ही किसी और को समझा पाते हैं
पर प्रेम की बलि न जाने कितने चढ़ जाते हैं।
अमृता के साथ बैठी थी प्रभा खेतान
जिसने सिमोन द बोउवार की रचना को हिंदी रूप दिया
स्त्री: उपेक्षिता के नाम से नया सृजन किया
और अपने शब्दों से समाज का प्रतिकार किया,
उसने भी हंस कर मेरे से प्रश्न किया
"बताना स्त्रियों का इन दशकों में क्या परिवर्तन हुआ,
क्या आज उस अबला उपेक्षिता का उद्धार हुआ,
या फिर आज भी वह किसी के इंतज़ार में है?
क्या अमृता या प्रभा के क़दमों पर आज भी पाबंदी है?"
अमृता प्रभा की बातों पर खिलखिला कर हंस पड़ी
वो कहने लगी, "क्या पूछ रही है यार तू भी,
क्या तुझे इतना भी पता नहीं, स्त्री कभी उपेक्षिता न थी,
उसने स्वयं ही स्वयं के लिए ये दशा है चुनी
बता, तूने या मैंने कभी किसी से हार मानी?
जैसा भी हो पथ हमने राह अपनी स्वयं ही बनाई!"
अनुपम मिश्र
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